Saturday, November 28, 2009

चाइल्ड यूलिप प्लान की बारीकियां जानें

प्राइवेट सेक्टर के एक बड़े कारोबारी हाउस में सीनियर एग्जिक्यूटिव मेघना अप्पाराव ने जब चाइल्ड प्लान खरीदने का फैसला किया, तो उनके दिमाग में मुंबई में 26/11 आतंकवादी हमलों के बाद कड़े किए गए सुरक्षा उपाय सबसे ऊपर थे। पांच बरस की अपनी बिटिया की उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय योजना बनाने की चाहत रखने वाली मेघना और उनके पति ने एक निजी बीमा कंपनी से चाइल्ड एजुकेशन प्लान खरीदने का फैसला किया।
उनका कहना है, 'खुद एमबीए ग्रेजुएट होने की वजह से मैं बढ़िया शिक्षा की अहमियत बखूबी समझती हूं और मुझे यह भी पता है कि भविष्य में यह काफी महंगी हो जाएगी। अगर हमने अभी से इसके लिए कुछ प्रावधान किए, तो बाद में बड़ी रकम जुटाना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए, हमने इस स्कीम पर निर्णय ले लिया।'
मेघना दरअसल अभिभावकों के उस समूह से ताल्लुक रखती हैं, जो चाइल्ड प्लान (यूनिट आधारित बीमा योजनाएं, जो माता-पिता की मृत्यु होने की स्थिति में भी वित्तीय लक्ष्य के लिए संसाधन मुहैया कराने का वादा करती हैं) में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं। इसे ऐसे टूल के तौर पर देखा जाता है, जो बच्चे की शिक्षा के लिए फंडिंग का इंतजाम कर सके। आने वाले सालों में शिक्षा का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा, ऐसे में आज अभिभावक चाहते हैं कि इस वित्तीय लक्ष्य के लिए पर्याप्त बचत की जाए और चाइल्ड यूलिप ऐसे सेगमेंट को आकर्षित कर रहे हैं, जो अपने बच्चे की बेहतर शिक्षा के लिए काफी संजीदा है।
जो जीवन बीमा कंपनियां इन स्कीम को आक्रामक रूप से प्रचारित कर रही हैं, उनका कहना है कि इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह बढ़िया उत्पाद है। अवीवा लाइफ इंश्योरेंस के डायरेक्टर-मार्केटिंग विशाल गुप्ता ने कहा, 'माता-पिता होने के नाते आप कुछ रकम अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अलग रखना चाहते हैं, चाहे वह बच्चे की शिक्षा हो या फिर शादी। चाइल्ड प्लान यह सुनिश्चित करने का काम करता है कि निश्चित वक्त पर आपको निश्चित रकम मिले, भले आप उस वक्त आप हों या हों। दूसरे निवेश माध्यम भी यह लक्ष्य हासिल करने में मदद देते हैं, लेकिन उनमें यह मानकर चला जाता है कि माता-पिता निवेश की समूची अवधि के दौरान पैसा लगाने के लिए मौजूद रहेंगे।'
पॉलिसीधारक का निधन होने की स्थिति में बीमित राशि सौंप दी जाती है और इसके अलावा भविष्य के सभी प्रीमियम से रियायत दे दी जाती है। बकाया प्रीमियम का जिम्मा बीमा कंपनियां खुद संभालती हैं और मैच्योरिटी पर फंड वैल्यू बालक या बालिका को मुहैया करा दी जाती है। अभिभावकों की मृत्यु या विकलांगता की वजह से आमदनी जाने के जोखिम से जुड़ा राइडर भी एक कारण है कि चाइल्ड प्लान को दूसरे निवेश विकल्पों पर तरजीह दी जाती है।
मैक्स न्यूयार्क लाइफ में प्रोडक्ट मैनेजमेंट हेड माणिक नांगिया ने कहा, 'माता-पिता होने के नाते आपको बच्चों की जरूरतें पूरी करने की क्षमता, महंगाई दर को पछाड़ने, रकम बढ़ाने के लिए बढ़िया रिटर्न जुटाने की क्षमता, निवेश सुरक्षा और अभिभावक की मृत्यु या जख्मी होने की सूरत में बच्चे की वित्तीय सुरक्षा जैसे विभिन्न मानकों के आधार पर निवेश विकल्पों की समीक्षा करने की जरूरत होती है।
सही निवेश विकल्प चुनने के लिए आपको इन पैमानों, अपनी उम्र और जोखिम सहने की क्षमता पर गौर करना चाहिए।' सामान्य तौर पर बीमा कंपनियां चाइल्ड प्लान को सभी मानकों पर खरा उतरने वाले एक समाधान के तौर पर प्रस्तुत करते हैं, जबकि फिक्स्ड डिपॉजिट, पब्लिक प्रॉविडेंट फंड, सोना और प्रॉपर्टी जैसे अन्य निवेश माध्यम किसी एक या दूसरे पैमाने पर खरे नहीं उतरते।
फाइनेंशियल प्लानर की मान्यता कुछ अलग है। उनका कहना है कि यह लक्ष्य किसी भी उत्पाद से पाया जा सकता है और अभिभावकों को कुछ खास उत्पादों के साथ 'चाइल्ड' शब्द जुड़ने से जाल में नहीं फंसना चाहिए। ये दूसरे यूलिप से ज्यादा अलग नहीं होते, जिसमें आपके प्रीमियम का एक हिस्सा मॉर्टिलिटी तथा दूसरे शुल्कों में जाता है, जबकि शेष आपकी पसंद के आधार पर इक्विटी, डेट या दोनों के संयोजन जैसे फंड में निवेश किया जाता है।
वित्तीय योजनाकार अमित पंडित का कहना है, 'बीमा और निवेश, दो अलग-अलग तरह के उद्देश्य पूरा करते हैं। इसलिए, बिना किसी ठोस वजह के इन दोनों को मिलाना सही कदम नहीं है।' उन्होंने कहा कि इक्विटी फंड में सिस्टेमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान और साथ में टर्म कवर खरीदना, ज्यादा बेहतर विकल्प है।
हालांकि, अगर आप इस बात को लेकर सुनिश्चित हैं कि चाइल्ड प्लान ही आपके बच्चे का वित्तीय भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए सही रास्ता है, तो कुछ ऐसी चीजे हैं जिन पर गौर करना बेहतर रहेगा। प्लान का खर्च मुख्य वजहों में से एक है। अगर चाइल्ड यूलिप प्रीमियम का बड़ा हिस्सा शुल्कों में ले रहा है, तो उसे खरीदने की सलाह नहीं दी जाएगी। बेनेफिट पर करीबी निगाह डालने से आपको पता चल जाएगा कि कितने शुल्क लगाए जाएंगे।
पंडित ने कहा, 'सबसे अहम है सही सवाल पूछना। आपको उसमें शामिल खर्च का ब्योरा एजेंट से पूछना चाहिए। इसके अलावा फंड के पोर्टफोलियो का हालिया अतीत और फंड के प्रदर्शन का सबूत मांगना चाहिए, जो फैक्टशीट से आसानी से पता लग सकता है।' इसके अलावा ऐसा फंड चुनिए, जिसमें प्रीमियम का एक हिस्सा सतर्कतापूर्ण रूप से निवेश किया जाए और ऐसा करते वक्त आपकी जोखिम सहने की क्षमता का ख्याल रखना चाहिए। ऐसे प्लान को नजरअंदाज करना बेहतर है, जिसमें बच्चे का जीवन बीमा किया जाता है।
इसके अलावा अभिभावकों को पूछना चाहिए कि तय वक्त से पहले बाहर निकलने पर कितना बोझ उठाना होगा। यह लंबी अवधि का निवेश है और नियमित रूप से प्रीमियम के भुगतान की जरूरत होती है, इसलिए खयाल रखना चाहिए कि ऐसे हालात में आपको किन बेनेफिट से हाथ धोना पड़ेगा। पॉलिसी के लिए दस्तखत करने से पहले लॉक इन और सरेंडर से जुड़े प्रावधानों को भी समझना जारी है। अगर आप इस बात को लेकर सुनिश्चित हैं कि पॉलिसी क्या मुहैया कराएगी और क्या नहीं, वह आपके वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सही है या नहीं, तो पॉलिसी की अवधि के दौरान समस्याएं पेश नहीं आएंगी।

Source : Media

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